Gohar, Mandi Shivratri

देवभूमि में मनाए जाने वाले त्यौहारों का बदलती ऋतुओं से सीधा संबंध है। प्रत्येक नई ऋतु के आने पर कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है लेकिन पहाड़ों के रीति-रिवाजों के अनुसार शिवरात्रि पर्व का अपना ही अलग अंदाज और वर्चस्व है ।

जी हां, मंडी के गोहर में शिवरात्रि के दिन अगर गांव में किसी घर में कोई भी जीव जन्म लेता है, जिसमें चाहे मनुष्य हो या फिर गाय, भेड़-बकरी, कुत्ता-बिल्ली तो गांव के सभी लोग मिलकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर खुशी से झूमते पहुंचते हैं। उस घर में शिवरात्रि पर्व के मौके पर प्रयुक्त होने वाले शिव-पार्वती के विवाह की वर माला जोकि पहाड़ी भाषा में विख्यात 'चंदो' को तैयार कर पूजा के लिए लाते हैं और जीव के जन्म लेने की खुशी में धाम का आयोजन किया जाता है।

रीति-रिवाज के अनुसार शिवरात्रि पर्व के आगमन पर क्षेत्र के युवा 15-20 दिनों से पहले ही मनोरंजन के लिए स्वयं ढोल-नगाड़े तैयार कर लेते हैं। गांव के जिस घर में चंदो को विराजित किया जाता है, वहां युवक, महिलाएं, बुजुर्ग सब शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना कर भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। उसके बाद शिव भक्तों की पूरी टोली गांव के सबसे निचले छोर से होते हुए सभी घरों में पहुंच कर खूब मनोरंजन तो करती है, साथ ही क्षेत्र की तरक्की व खुशहाली की कामनाएं भी करती है।

साहित्यकार डा. विजय विशाल, डा. जगदीश शर्मा व कारदार सुरेंद्र कुमार आदि ने बताया कि पहाड़ी रीति-रिवाजों को संजोए रखते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी शिवरात्रि का पूजन निरंतर काल से करते आ रहे हैं। भौगोलिक परिदृश्य के अनुसार पहाड़ों के शिवरात्रि पर्व का बड़ा महत्व है। यहां शिवरात्रि का पर्व 15 दिनों तक मनाने का प्रचलन रहा है, जोकि शिवरात्रि के 8वें दिन जिससे आठोत्रा और 15वें दिन को पंद्रेहरा के नाम से जाना जाता है, उन दिनों शिव-पार्वती के पूजन को रखे बड़े रोट को पानी के भाप पर फिर से ताजा कर सभी प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

कुंडली न मिले या फिर ग्रह गोचर बनें बाधा तो इस तरह होती है शादी

रीति-रिवाजों के मुताबिक कई बार शास्त्र विद्या को भी पंगु बनाकर जिस किसी वर-वधू की कुंडली का मिलान नहीं हो रहा हो या ग्रह गोचर के कारण विवाह में विघ्न वाली दशा हावी हो तो बिना कुंडली मिलान और बिना मंत्रोच्चारण के ही शिवरात्रि के मौके पर शादी करवा दी जाती है।

धाम न दें तो यह करना होगा

अगर धाम के आयोजक उस दौरान टोली के रूप में लोगों को नजर अंदाज करने की कोशिश करते हैं तो टोली में शामिल शिव भक्त उस मकान की दूसरी मंजिल (बोहड़ी) जोकि लकड़ी की तख्तनुमा के रूप में होती है, उस पर पूरी टोली खूब उछलकूद करती है, जिससे उसे अपने घर के ढहने का खतरा महसूस हो जाता है। ऐसी सूरत में अगर किसी व्यक्ति द्वारा खर्चा वहन करने की क्षमता नहीं हो तो वह ग्रामीणों की टोली को गुड़ की भेली देकर निपटारा कर लेते हैं लेकिन उन्हें आने वाली आगामी शिवरात्रि के त्यौहार पर धाम का बंदोबस्त करना ही होता है।

   🙏 बम बम भोले 🙏

Comments

Popular posts from this blog

Sair Festival - सैरी साजा

Gaiety Theater